सूत सकल वरणॊ कथा , करौ मोहि परिपोष ।
श्रवण रधृ पीयूष सम , पिवत नहीं सन्तोष ।।
सूत कठिन कलि काल अरम्भा । शिव की कथा श्रवन अवलम्वा ।।
शिव रहस्य यदि भांति अनेका । सुगम विशेष समेत विवेका ।।
चारि सहस नव सै सत्ताउन । गये वर्ष कलि पृजा नसाउन ।।
आनि वर्ष पृति अध अधिकारी । बहु व्यभिचार करै नरनारी ।।
मृषा वचन निशि वासर भाषै । छल अरु कपट दंभ उर राषै ।
धर्म रहित पातक अनुसारा । दुराचार अनहित अपकारा ।।
पर-पवाद परधन अभिलाषी । पर पतनी रस पय मन भाषी ।।
दो0-
जनपद वेंचै अन्न रस ,दृज गण वेचैं वेद ।
केश पृसारनि कामिनी , नष्ट सकल वस षेद ।।
दृज वैश्यारत मदिरा पाना । बरण भृष्ट सब पशू समाना ।
बहु विस्वासधात जन करिहै । निज निज मत पाखंड पसरिहै ।।
पति वंचक पर पति रत नारी । सास ससुर वर वैर विचारी ।।
कुटिल कुतंत्र कुमारग गामी । मात पितहि दूसहि षल कामी ।।
पापी पतित अधम अपराधी । होय सकल जन गरसित व्याधी ।।
विप़़ करै सूद़़न कर करमा । साधहि सूद़़ दुजन के धरमा ।।
वधहि विप़़ गुरु वेदउ गाई । क्षेत्र हरै नृप करि कुटिलाई ।।
नारि स्वतंत्र पुरुष परतंत्रा । वरधि पाप सब चहै निमंत्रा ।।
दो0-
धोर पाप कलिकाल के ,कोटिन कठिन कराल ।
करै सकल नर ना तरै , विनआसै भृम जाल ।।
कलि षल पावे सवै सुख । संत सुजन संताप ।
सूत प़़बोधउ ग्यान गुण , किमि वरजै सो पाप ।।
नर त्रिय वैर रमै पर दारा । सो त्रिय विलसै पर भरतारा ।।
काम विवस निज नारि दुलारै । हुय स्वतंत्र त्रिय जार सिधारै ।।
होय वरण शंकर दुय प़़ेरे । परै नरक लै पितर धनेरे ।।
एहि विधि होय अनेकन दोषा । केहि विधि मनुज लहै संतोषा ।।
सूत कहेउ शिव कथा विशाला । छूटहिं पाप दूषन भृम जाला ।।
तुम सब जानत व्यास प़़शादा । भाषहु सुगम शंभु मरजादा ।।
तब मुख कथा अमी रस धारा । पिवै श्रवण पुट वनै विचारा ।।
निर्गुण शंभु सगुण केहि भांती । कहौ सुगम शिव कथा सुहाती ।।
दो0-
किमि तिष्टहिं शिव सृष्टि के , आदि मध्य अरु अन्त ।
किमि सेवै शिवधाल शिव , सद प़़सीद चित संत ।।
सो0-
हुय प़़शन्न का देत , त्रिकालज्ञ सर्वज्ञ शिव ।
सूत करौ चित चेत , अहो लोम हर्षन तनय ।।
स्थाणोर्चरितृम्
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