Monday, July 12, 2010

सूत सकल वरणॊ कथा , करौ मोहि परिपोष ।

श्रवण रधृ पीयूष सम , पिवत नहीं सन्तोष ।।

सूत कठिन कलि काल अरम्भा । शिव की कथा श्रवन अवलम्वा ।।

शिव रहस्य यदि भांति अनेका । सुगम विशेष समेत विवेका ।।

चारि सहस नव सै सत्ताउन । गये वर्ष कलि पृजा नसाउन ।।

आनि वर्ष पृति अध अधिकारी । बहु व्यभिचार करै नरनारी ।।

मृषा वचन निशि वासर भाषै । छल अरु कपट दंभ उर राषै ।

धर्म रहित पातक अनुसारा । दुराचार अनहित अपकारा ।।

पर-पवाद परधन अभिलाषी । पर पतनी रस पय मन भाषी ।।

दो0-
जनपद वेंचै अन्न रस ,दृज गण वेचैं वेद ।

केश पृसारनि कामिनी , नष्ट सकल वस षेद ।।

दृज वैश्यारत मदिरा पाना । बरण भृष्ट सब पशू समाना ।

बहु विस्वासधात जन करिहै । निज निज मत पाखंड पसरिहै ।।

पति वंचक पर पति रत नारी । सास ससुर वर वैर विचारी ।।

कुटिल कुतंत्र कुमारग गामी । मात पितहि दूसहि षल कामी ।।

पापी पतित अधम अपराधी । होय सकल जन गरसित व्याधी ।।

विप़़ करै सूद़़न कर करमा । साधहि सूद़़ दुजन के धरमा ।।

वधहि विप़़ गुरु वेदउ गाई । क्षेत्र हरै नृप करि कुटिलाई ।।

नारि स्वतंत्र पुरुष परतंत्रा । वरधि पाप सब चहै निमंत्रा ।।

दो0-
धोर पाप कलिकाल के ,कोटिन कठिन कराल ।

करै सकल नर ना तरै , विनआसै भृम जाल ।।

कलि षल पावे सवै सुख । संत सुजन संताप ।

सूत प़़बोधउ ग्यान गुण , किमि वरजै सो पाप ।।

नर त्रिय वैर रमै पर दारा । सो त्रिय विलसै पर भरतारा ।।

काम विवस निज नारि दुलारै । हुय स्वतंत्र त्रिय जार सिधारै ।।

होय वरण शंकर दुय प़़ेरे । परै नरक लै पितर धनेरे ।।

एहि विधि होय अनेकन दोषा । केहि विधि मनुज लहै संतोषा ।।

सूत कहेउ शिव कथा विशाला । छूटहिं पाप दूषन भृम जाला ।।

तुम सब जानत व्यास प़़शादा । भाषहु सुगम शंभु मरजादा ।।

तब मुख कथा अमी रस धारा । पिवै श्रवण पुट वनै विचारा ।।

निर्गुण शंभु सगुण केहि भांती । कहौ सुगम शिव कथा सुहाती ।।

दो0-

किमि तिष्टहिं शिव सृष्टि के , आदि मध्य अरु अन्त ।

किमि सेवै शिवधाल शिव , सद प़़सीद चित संत ।।

सो0-

हुय प़़शन्न का देत , त्रिकालज्ञ सर्वज्ञ शिव ।

सूत करौ चित चेत , अहो लोम हर्षन तनय ।।


स्थाणोर्चरितृम्